जिक्र जरूरी था… क्योंकि रुबरू जो कराना है आने वाली पीढ़ियों को, उस पीढ़ी को जो जरा सी धूल देख मुंह ढक लेती है। थोड़ी सी शारीरिक मेहनत से मुंह मोड़ती पीढ़ी, जो चढ़ नहीं पाती दो से तीन मंजिला सीढ़ी, उन्हें देखना चाहिए कि कैसे उनके पूर्वजों ने पहाड़ के पहाड़ फांद डाले…. कैसे दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद दो रोटी जहां जगह दिखी वहीं ऊपर वाले का आभार जता उसे ग्रहण किया। आज की चाउमिन, पिज्जा खाने वाली…जरूरी सामान के लिए कमरे तक से बाहर न जाने वाली पीढ़ी को समझना होगा कि आरामदायक जीवन न सिर्फ कई तरह की बीमारियों को जन्म दे रहा है, बल्कि उनकी परंपराओं, उनकी विरासत भी लील (खत्म करना) रहा है। तस्वीर टिहरी जिले के गांव की एक शादी की है, आप देख सकते हैं कि दिनभर के कार्यक्रम के बाद कैसे दो लोग बिना किसी श्रृंगार की हुई जमीन ( यानि कि जमीन पर कोई कालीन, मैट आदि नहीं है) पर बैठ के ही खाना खा रहे हैं। इस दृश्य को देख कई लोग बहुत कुछ सोचेंगे, काफी कुछ कहेंगे, लेकिन उन्हें इसके आनंद (आमोद) की अनुभूति शायद कभी न हो पाए…..
